रविवार, मई 08, 2022

बेड़ी



बेड़ी पैर में डाली है,
मैं उड़ कहीं न पाया हूं।
पंखों को खुद ही मैंने,
बांध किनारे रखा है।
कमरा है ताबूत के जैसा,
घुप अंधेरा, सन्नाटा है।
बैठ गया अब आके इसमें,
चाबी कहीं फेंक आया हूं।
बेड़ी पैर में डाली है,
मैं उड़ कहीं न पाया हूं।

हर सहर-सहर मैं, सिहर-सिहर के,
हक्का-बक्का जागा हूं।
सन्नाटे के शोर में खुद को
जाने कहां खो आया हूं।
आशाओं की चादर है पर,
किसी और को उड़ा आया हूं।
बेड़ी पैर में डाली है,
मैं उड़ कहीं न पाया हूं।

-- नीर

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेड़ी काट दीजिये । मन के पंखों से सारी दुनिया नाप लीजिये ।

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  2. muhammad solehuddin12/24/2022 02:22:00 pm

    अच्छी जानकारी !! आपकी अगली पोस्ट का इंतजार नहीं कर सकता!
    क्षमा करें अगर मेरी भारतीय भाषा को समझना मुश्किल है
    greetings from malaysia
    द्वारा टिप्पणी: muhammad solehuddin
    शुक्रिया

    जवाब देंहटाएं

आपके विचार एवं सुझाव मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं तो कृपया अपने विचार एवं सुझाव अवश दें. अपना कीमती समय निकाल कर मेरी कृति पढने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.