बेड़ी पैर में डाली है,
मैं उड़ कहीं न पाया हूं।
पंखों को खुद ही मैंने,
बांध किनारे रखा है।
कमरा है ताबूत के जैसा,
घुप अंधेरा, सन्नाटा है।
बैठ गया अब आके इसमें,
चाबी कहीं फेंक आया हूं।
बेड़ी पैर में डाली है,
मैं उड़ कहीं न पाया हूं।
मैं उड़ कहीं न पाया हूं।
पंखों को खुद ही मैंने,
बांध किनारे रखा है।
कमरा है ताबूत के जैसा,
घुप अंधेरा, सन्नाटा है।
बैठ गया अब आके इसमें,
चाबी कहीं फेंक आया हूं।
बेड़ी पैर में डाली है,
मैं उड़ कहीं न पाया हूं।
हर सहर-सहर मैं, सिहर-सिहर के,
हक्का-बक्का जागा हूं।
सन्नाटे के शोर में खुद को
जाने कहां खो आया हूं।
आशाओं की चादर है पर,
किसी और को उड़ा आया हूं।
बेड़ी पैर में डाली है,
मैं उड़ कहीं न पाया हूं।
हक्का-बक्का जागा हूं।
सन्नाटे के शोर में खुद को
जाने कहां खो आया हूं।
आशाओं की चादर है पर,
किसी और को उड़ा आया हूं।
बेड़ी पैर में डाली है,
मैं उड़ कहीं न पाया हूं।
-- नीर

बेड़ी काट दीजिये । मन के पंखों से सारी दुनिया नाप लीजिये ।
जवाब देंहटाएंअच्छी जानकारी !! आपकी अगली पोस्ट का इंतजार नहीं कर सकता!
जवाब देंहटाएंक्षमा करें अगर मेरी भारतीय भाषा को समझना मुश्किल है
greetings from malaysia
द्वारा टिप्पणी: muhammad solehuddin
शुक्रिया