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शुक्रवार, नवंबर 17, 2017

सन्नाटा



ज़िंदगी बस यूँही धुआं हो गयी,
शोलों की आग न जाने कब ठंडी हो गयी.

साहिलों पे पड़े थक गए पत्थर,
लेहेर न जाने कब परायी हो गयी. 

रिस्ता रहा हर ख्वाब पल दर पल,
सफ़ेद किताब न जाने कब काली हो गयी. 

कभी न बुद-बूदाया नाम तेरा मैंने,
खुदा तेरी न जाने कब खुदाई हो गयी. 

मिलते जो थे राहगीर अक्सर तुझे 'नीर'
राहों से उनकी न जाने कब जुदाई हो गयी. 

--नीर

शनिवार, अगस्त 12, 2017

मुक्कमल ख़्वाब


आज दराज़ में जब कुछ लम्हे टटोले,
तो हाथ मेरे कुछ पुर्ज़े लगे.
कुछ ख़्वाब का चश्मा चढ़ाये,
तो कुछ हकीकत से भरे साथ खड़े थे.

जो चश्मे में थे वो रंगीन थे,
हकीकत के दो रंग में संगीन थे,
एक को हसरत थी कायम होने की,
दूसरे खामोशी से बस मुस्कुराए खड़े थे.

जो चश्मे में थे वो किस्मत को कोस रहे थे,
और दो रंगी, किस्मत का हाथ थामे खड़े थे.
हाथ बढ़ाया है आज ख़्वाबों की तरफ उन्होंने ,
मुक्कमल हों अब वो शायद जो न जाने कब से
हकीकत से महरूम एक कोने में पड़े थे.

--नीर 

शुक्रवार, अप्रैल 21, 2017

बेपरवाह


वो यूंही बस छूके चली जाती है,
बालों को सहला कर, चुपके से गुज़र जाती है।
क्या थामूँ हाथ अब उस बेपरवाह का,
हवा ही तो है, बस सेहला के गुज़र जाती है।
- नीर

बुधवार, सितंबर 28, 2016

पोटली


आसमां की पोटली में 
जगमगाते टुकड़े तू 
समेट के लादता है कैसे?
हर टुकड़ा जो रात के सफ़र 
में भी हिलता नहीं?

-- नीर

गुबार



किसी की ज़िन्दगी मे वक्त है,
किसी के वक्त मे ज़िन्दगी।
कहीं चार मीनार हैं तो,
कहीं मीनारें हैं बस चार।
है कहीं ज़िन्दगी गुलज़ार,
तो कहीं है बेज़ारी का बाज़ार।

रहने को यूँ तो हैं घरोंदे बहुत,
पर नींद से जगा देने वाले हैं हज़ार।
परछाईअों की भी अाहट है यहां,
बिखरा है सीलन पे परतौं का गुबार।
बह जाने दे गालों को छूके अब,
हो जाने दे 'नीर'-ऐ-दरिया मे शुमार।

-- नीर

शनिवार, मई 08, 2010

बुत

ये दुनिया 
बड़ी नादान है, 
हर रंगीन 
बुत को 
भगवान 
समझ लेती है. 
हाथ बढ़ा दे 
गर कोई 
प्यार का.
रावन को भी
राम समझ
लेती है.

--नीरज 

कश्ती

ख़्वाबों की एक कश्ती है,
जो पलकों की वादी के पार
रोज़ चली आती है.
कभी सतरंगी ख्वाब लाती है
कभी बेरंगी ख्वाब सजा लाती है.

--नीरज