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बुधवार, सितंबर 11, 2019

365 days valentine



आज कुछ बीती गलिओं से गुज़री,
तो आँखें कुछ नम सी हो गयीं।
हवाएँ जो बस यूँहीं बह रही थीं,
एक नज़्म सी हो गयीं। 

10 KM पैदल घर आते थे,
किराया बचा कर मेरे लिए जलेबी जो लाते थे तुम।
अदृश्य तोंद को पिचकाने का कह कर,
मुझे दिन-दहाड़े बरगलाते थे तुम। 

कैसे भूलूँ वो दिवाली की रातें,
कांख से कई बार सिली कमीज़ को भी नया बता जाते थे,
हज़ारों में भी चमकूं, तो नई साड़ी ले आते थे तुम। 

वो सुनहरी चप्पलें याद हैं?
जो मेरे जन्मदिन पे तुम ने दिलायीं थी?
मुझे क्या मालूम नहीं,
तुमने उनकी कीमत अपने तलवों के छालों से चुकाई थी.

तुम्हे क्या लगता रहा ता-उम्र की मुझे इल्म नहीं?
इल्म था, कि सदा तुम्हारी खुशी मेरी और मेरी तुम्हारी रही। 
तब तो बस हर पल हम दोनों को अपना साथ था,
अब पता चला की वो तो अपना 365 days valentine था। 

--नीर 

सोमवार, फ़रवरी 12, 2018

अकेलापन


कभी कभी  कितना अकेलापन हो जाता है,
खुद ही बोलता है और खुद को सुनता है।
दिल रोज़ की तरह खुद धड़कता है,
और खुद की धड़कन आप सुनता है।
कभी कभी  कितना अकेलापन हो जाता है।

आईने के सामने खड़ा खुद को निहारता है,
अपनी ही मुस्कान से मुस्करा कर मिलता है।
बाएँ हाथ से दाएँ को थाम लेता है,
मुश्किलों में खुद को हिम्मत दिलाता है।
कभी कभी  कितना अकेलापन हो जाता है।

कभी जब आँख से आँसू बह जाता है,
पलकों से पौंछ के ढांढस बंधाता है।
कभी कभी  कितना अकेलापन हो जाता है,
-- नीर

शुक्रवार, नवंबर 17, 2017

सन्नाटा



ज़िंदगी बस यूँही धुआं हो गयी,
शोलों की आग न जाने कब ठंडी हो गयी.

साहिलों पे पड़े थक गए पत्थर,
लेहेर न जाने कब परायी हो गयी. 

रिस्ता रहा हर ख्वाब पल दर पल,
सफ़ेद किताब न जाने कब काली हो गयी. 

कभी न बुद-बूदाया नाम तेरा मैंने,
खुदा तेरी न जाने कब खुदाई हो गयी. 

मिलते जो थे राहगीर अक्सर तुझे 'नीर'
राहों से उनकी न जाने कब जुदाई हो गयी. 

--नीर

शनिवार, अगस्त 12, 2017

मुक्कमल ख़्वाब


आज दराज़ में जब कुछ लम्हे टटोले,
तो हाथ मेरे कुछ पुर्ज़े लगे.
कुछ ख़्वाब का चश्मा चढ़ाये,
तो कुछ हकीकत से भरे साथ खड़े थे.

जो चश्मे में थे वो रंगीन थे,
हकीकत के दो रंग में संगीन थे,
एक को हसरत थी कायम होने की,
दूसरे खामोशी से बस मुस्कुराए खड़े थे.

जो चश्मे में थे वो किस्मत को कोस रहे थे,
और दो रंगी, किस्मत का हाथ थामे खड़े थे.
हाथ बढ़ाया है आज ख़्वाबों की तरफ उन्होंने ,
मुक्कमल हों अब वो शायद जो न जाने कब से
हकीकत से महरूम एक कोने में पड़े थे.

--नीर 

सोमवार, जून 26, 2017

पहेली


अमावास की रात है कैसी,
न उगती है न ढलती है.

सिहरन देह में है कैसी, न
सिकुड़ती है न ठिठुरती है.

भंवर में कश्ती है ये कैसी,
ने उभरती है न डूबती है.

पहेली है ये ज़िन्दगी कैसी,
न थमती है न चलती है.

--नीर

रविवार, जून 25, 2017

सपनों का शहर


ये जंग्लों में सिमटी खिड़कियाँ ,
ये बिन balcony के आशियाँ.
आसमान चूमती इमारतें और,
बेसुध भागती ज़िंदगियाँ।

सड़क पे, फुटपाथ पे,
भागता ये इंसानी रेला है.
भीतर के शोर को मुँह में दबाये,
ये बस एक जिस्मानी मेला है.

टूटी सड़कों पे, जलाशय बने गड्ढों पे
दौड़ता, ये हाड़-माँस का ठेला है.
छाते से ढाँपता, rain coat से बचाता,
दिल फिर भी मेरे यार तेरा गीला है.

5 बजे cooker की सीटी,
मेरी सुबह का रोज़ alarm है.
Local में पिस्ती रोज़ ज़िन्दगी,
मेरा बस यही समागम है.

--नीर

शुक्रवार, अप्रैल 21, 2017

बेपरवाह


वो यूंही बस छूके चली जाती है,
बालों को सहला कर, चुपके से गुज़र जाती है।
क्या थामूँ हाथ अब उस बेपरवाह का,
हवा ही तो है, बस सेहला के गुज़र जाती है।
- नीर

बुधवार, सितंबर 28, 2016

पोटली


आसमां की पोटली में 
जगमगाते टुकड़े तू 
समेट के लादता है कैसे?
हर टुकड़ा जो रात के सफ़र 
में भी हिलता नहीं?

-- नीर

गुबार



किसी की ज़िन्दगी मे वक्त है,
किसी के वक्त मे ज़िन्दगी।
कहीं चार मीनार हैं तो,
कहीं मीनारें हैं बस चार।
है कहीं ज़िन्दगी गुलज़ार,
तो कहीं है बेज़ारी का बाज़ार।

रहने को यूँ तो हैं घरोंदे बहुत,
पर नींद से जगा देने वाले हैं हज़ार।
परछाईअों की भी अाहट है यहां,
बिखरा है सीलन पे परतौं का गुबार।
बह जाने दे गालों को छूके अब,
हो जाने दे 'नीर'-ऐ-दरिया मे शुमार।

-- नीर

रविवार, अप्रैल 21, 2013

तुम अकेले नहीं हो








ख़ामोशी ने दबे पाँव आकर 
बुद-बुदाया कि तुम अकेले नहीं हो. 

रास्ते ने मिलकर हाथ थामा 
और बताया कि तुम अकेले नहीं हो. 

समन्दर ने भिगा के पाँव 
एहसास दिलाया कि तुम अकेले नहीं हो. 

फिजा ने सहलाके बालों को 
जताया है की तुम अकेले नहीं हो. 

फूलों की सुगंध ने महकाया 
और समझाया है कि तुम अकेले नहीं हो. 

बारिश की बूंदों ने भिगोया 
और सिखाया की तुम अकेले नहीं हो. 

--नीरज
 

शुक्रवार, नवंबर 30, 2012

क्या तू मेरा और मैं तेरा - An honor killing

वो गलियाँ जो कभी हाथ पकड़ कर मेरा,
मुझ में समां जातीं थीं, कहतीं थीं मुझे
कि वो मेरी और मैं हूँ उनका।

आज लौटा हूँ शहर कई अरसे बाद जब,
हर गली, हर चौराहे, हर इमारत पे,
एक अजीब सा, बदरंगी, मटमैला सा 
नकाब चढ़ा है। 
क्या ये तू ही है जो कहता था कि 
तू मेरा और मैं हूँ तेरा।

पहुंचा गली में अपनी मैं जब,
मूह कुछ इस कदर फेर लिया 
मानो कोई बदतमीज़, बेगैरत 
घुस आया है।
क्या ये तू ही है जो कहती थी कि 
तू मेरी और मैं हूँ तेरा

पहुंचा घर में अपने मैं जब,
अन्धयारी तब छाई थी , सन्नाटा वो ले आई थी,
आँगन में कुछ छींटे थे, दीवारों पे रेले थे,
क्या तू वो ही घर है जो कहता था कि 
तू मेरा और मैं हूँ तेरा।

--नीरज

गुरुवार, नवंबर 15, 2012

घटा



घिर आए हो कुछ यूँही तुम,
पलकों पे बैठे तारे तुम,
घनघोर घटा की बदरी में 
मुझको जा खो आए तुम।

सीला सीला आँगन अब तक,
भीना भीना महक रहा था,
सूखी दहलीज़ के खातिर 
मुझको जा खो आए तुम।

ख़त के पुर्जे सालों जोड़े,
स्याह स्याही के हर मोती जोड़े,
सुनहरे अक्षर के खातिर 
मुझको जा खो आए तुम।

--नीरज

शनिवार, सितंबर 15, 2012

ज़िन्दगी




ज़िन्दगी तू दिखाती है न जाने कितने रूप,
कितने रूप तू इंसान से बदलवाती है.
कह जाती है कभी दास्ताँ पल में,
कभी सालों ठहर के दास्ताँ बनाती है.
रूठता है जो कोई कभी तुझसे,
पल में उसे हंसा मना भी लेती है.
साए लाख देती है ज़िन्दगी में,
उजाले से फिर तू मिटा भी देती है.

--नीरज

बुधवार, मई 23, 2012

गुमनाम





कई ऐसे लोग हैं जिनकी वजह से हमारे देश को एक नई पहचान मिली पर.......एवज़ में उन्हें सिर्फ गुमनामी के काले साए मिले.......
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तरंग उठी फिर
भोर भई,
सप्तक नाच
मद-मस्त हुई.

कुछ चेह्के,
कुछ महके,
लगने लगे,
तबले पे ठेके.

कुछ नाम मिले,
गुमनाम मिले.
जो मिले कहीं,
वो खाख मिले.

स्याह रात खिली,
पहचान मिली,
सब भूल गए,
वो पहचान मिली.

लाचारी की गलिओं में,
बहरों की इस बस्ती में.
डूब गए अरमान सभी,
बिन पतवार की कश्ती में.

--नीरज

सोमवार, मई 14, 2012

सफहा

 

वक़्त ने अपनी कुछ गिरहें खोलीं हैं 
या कोई ख्वाब ओस बन के उभरा है.
फैली कुछ आढी-तिरछी लकीरें हैं
या कोई ख्वाब सफ्हे पे उभरा है.

--नीरज

शनिवार, मई 12, 2012

बादल



नीले आकाश के नीचे कुछ बादल अब बरसे हैं,
कच्चे घर की दीवारों पे कुछ रेले जा पसरे हैं.

सूरज जा अब चाँद उगा है, वो भी कुछ गीला-गीला है.
ताप रहा है आग भी लम्हा, वो भी कुछ सीला-सीला है.

- नीरज

शुक्रवार, फ़रवरी 24, 2012

चौखट



झुर्रियों की चौखट पे आज भी
एक शाम तनहा बैठी है,
वो बस यूँही हर सुबह दरवाज़ा
खुलने की चाह लिए चली आती है.

रोज़ वो तनहा, बेरंग अपना सा मुंह
ले कर लौट जाती है, और सोचती है
कि किसी रोज़ वो इस ऊबड़-खाबड़,
बंजर धरती पे हल का मलहम लगाएगा
और ये बेज़ार पल में नम हो जाएगी.

अब और नहीं होता इंतज़ार उससे,
अकेलेपन के खप्पर भी अब कांपने लगे हैं.
टक-टकी लगाये वो कई सालों से यूँही बैठी है,
जाने कब दस्तक हो और शफ़क पे माँ शब्द बिखर जाए.

--नीरज

सोमवार, दिसंबर 12, 2011

झुर्रियां

 

रात के चेहरे पे कुछ झुर्रियां उभर आई हैं, 
जाने खुद उकरी हैं या अँधेरे ने चाँद का नकाब छीन लिया है. 

ज़री की चादर से सितारे भी छिटक गए हैं, 
जाने वो खुद बेनूर हुई है या फंदा दर फंदा उधेडा गया है. 

 --नीरज

शनिवार, सितंबर 24, 2011

रात



पसर-पसर के चल रही है क्यों रात.
कितने करवट चल लिए,
न जाने कितने करवट बाकी हैं.

हर लम्हा टिक-टिक कर चाक की धुन पर गिरता है.
कितनी धुन हैं सुनलीं अब तक,
न जाने कितनी धुनें अभी बाकी हैं.

आढ़े-तिरछे रेले गीले हैं अब तक.
कितनी बूँदें बह गयीं,
न जाने कितनी अब भी बाकी हैं.

-- नीरज

बुधवार, अगस्त 03, 2011

ज़िन्दगी



मायने ज़िन्दगी के बदलने लगे हैं,
गुलशन में ख़ार अब लगने लगे हैं.

मुस्कुरा लेती थी ज़िन्दगी अक्सर यूँही,
उसे अब अमावस के साए डसने लगे हैं.

लाली शफ़क की जलाती है आसमां को,
स्याह रात के तारे उसे बुझाने लगे हैं.

वक़्त का चाक खाली घूमता रहा अब तक,
ज़िन्दगी को उसपे अब हम गड़ने लगे हैं.

बंजर ज़मीन पे आता न था कोई भी,
काली घटा के मेले अब लगने लगे हैं.

--नीरज