बुधवार, सितंबर 28, 2016

पोटली


आसमां की पोटली में 
जगमगाते टुकड़े तू 
समेट के लादता है कैसे?
हर टुकड़ा जो रात के सफ़र 
में भी हिलता नहीं?

-- नीरज

गुबार



किसी की ज़िन्दगी मे वक्त है,
किसी के वक्त मे ज़िन्दगी।
कहीं चार मीनार हैं तो,
कहीं मीनारें हैं बस चार।
है कहीं ज़िन्दगी गुलज़ार,
तो कहीं है बेज़ारी का बाज़ार।

रहने को यूँ तो हैं घरोंदे बहुत,
पर नींद से जगा देने वाले हैं हज़ार।
परछाईअों की भी अाहट है यहां,
बिखरा है सीलन पे परतौं का गुबार।
बह जाने दे गालों को छूके अब,
हो जाने दे 'नीर'-ऐ-दरिया मे शुमार।

-- नीरज