ज़िन्दगी
मायने ज़िन्दगी के बदलने लगे हैं,
गुलशन में ख़ार अब लगने लगे हैं.
मुस्कुरा लेती थी ज़िन्दगी अक्सर यूँही,
उसे अब अमावस के साए डसने लगे हैं.
लाली शफ़क की जलाती है आसमां को,
स्याह रात के तारे उसे बुझाने लगे हैं.
वक़्त का चाक खाली घूमता रहा अब तक,
ज़िन्दगी को उसपे अब हम गड़ने लगे हैं.
बंजर ज़मीन पे आता न था कोई भी,
काली घटा के मेले अब लगने लगे हैं.
--नीरज
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ख़याल
वक़्त की मेज़ पे कुछ ख़याल अदबुने ही छूट गए थे.
जान पड़ता है की मेरी नींद की चाबी हाथ लग गयी है उनके,
रह रह कर उन्होंने मेरे ख़्वाबों में आना सीख लिया है.
कुछ तो बारिश के पतंगों की तरह बिन बुलाये चले आते हैं,
ऐसा मालूम होता है की कोई सैलानी आया, रुका.....और चला गया.
कुछ मोर बन कर आते हैं, निशानी के तौर पर पंख छोड़ जाते हैं.
तुम जो आओ अगली बार तो मोर बनकर आना
तुम्हे स्याही में भिगो के कागज़ पे उकेर लूँगा.
--नीरज
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कुछ यूँही
इक रात तेरी उस शाख के ऊपर
कुछ ख्वाब मैंने जा रखे थे
कुछ फीका फीका स्वाद था उनका
पकने को मैंने रख छोड़े थे.
बारिश की बूंदों से वो कुछ
खारे खारे लगते हैं,
कांप रहे थे एक कोने में वो
तपने को बाहों में तेरी रख छोड़े है.
- नीरज
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सीली ज़िन्दगी
गुज़र रहे हैं पल ख़ामोशी से,
लम्हा लम्हा सीला है.
खामोशी की आहट है बस
हर करवट दिल भीगा है.
तंग गलिओं के चोराहों पे
रोज़ नाचती है ज़िन्दगी,
हर कच्चे घर के आँगन में
सूरज अब तक भीगा है
जितने करवट ले लो चाहे,
ये नींद कभी न टूटेगी.
रात की दो रोटी का स्वाद
यहाँ तो अब तक फीका है.
--नीरज
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लाल भारत
खूब उड़ा है लाल गुलाल,
रंग हुआ है देश का लाल.
मन मानी भाई करी है सबने,
कौन बना है देश का लाल??
लालगढ़ के लाल हैं लाल,
बरफ भी हुई है फिर से लाल.
परवाह है भाई तुमको किसकी,
लगा के घूमो बत्ती लाल.
डुबा-डुबा के डुबा दिया है,
खेल भी कर दिये तुमने लाल.
फिर भी शर्म से भैया तोरे,
नहीं हैं बिलकुल लाल ये गाल.
जाने कैसे सुनोगे तुम ये,
कैसे होगी पतली खाल??
--नीरज
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लिबास
तू आएगी न जाने किस लिबास में
दामन में गिरेगी या मुझे ले उड़ेगी,
न दाएरे होंगे न बंदिशें कोई किसी की,
सुकून को मेरे दामन में सौंप जायेगी.
छुउंगा आसमां, हवा को काटूँगा मैं,
सूरज की किरणों से मुझे पावन करेगी.
तू किसी रोज़ यूँही चली आएगी या
रोज़ एक अहसास के साथ आएगी.
कभी फुर्सत मिले तो बताना मुझे,
मौत तू किस लिबास में आएगी.
--नीरज
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लहर
ये नदी और इस के ये दो किनारे,
सदियों से दो भाई जुदा हों, लगता है.
लहरें रोज़ आती हैं दोनों से मिलने,
दोनों को छूती हैं और चली जाती हैं.
कौन जाने ये कहीं बीच में ही खो जाती हैं या
एक भाई का सन्देश दुसरे को पहुंचती हैं.
कई दिन गुज़रे हैं तोहफा नहीं लायी लहर,
न सन्देश लायी है कोई उस पार से.
पिछली बार कुछ चिकने पत्थर आये थे,
तो कुछ यहाँ से भी भिजवाए थे जवाब में.
आज कल माहोल शांत है, यहाँ का भी वहां का भी,
लगता है लहर ने आज कल सीधा बहना सीख लिया है.
ये नदी और इस के ये दो किनारे,
सदियों से दो भाई जुदा हों, लगता है.
--नीरज
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फासले
चाहतें हैं दरमियाँ, फिर भी दूरी न जाने क्यों है,
आहटें हैं दरमियाँ, फिर भी ख़ामोशी न जाने क्यों है?
आयतें लिखी हैं दिलों पे दोनों के एक ही,
भाषा खामोश ये दिल की न जाने क्यों है?
एक ही शहर में थामे खड़े हैं हाथ कबसे,
फिर भी मीलों की ये दूरी न जाने क्यों है?
सिमट आते हैं कभी रास्ते दरमियाँ अपने,
चाहत छिपाना तुझे लाज़मी न जाने क्यों है?
जुल्फों के ख़म मेरी नज़रों से सुलझाती है,
हथेली पे आइना फिर भी न जाने क्यों है?
--नीरज
ख़म = curls
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