शुक्रवार, अप्रैल 21, 2017

बेपरवाह


वो यूंही बस छूके चली जाती है,
बालों को सहला कर, चुपके से गुज़र जाती है।
क्या थामूँ हाथ अब उस बेपरवाह का,
हवा ही तो है, बस सेहला के गुज़र जाती है।
- नीरज

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

आपके विचार एवं सुझाव मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं तो कृपया अपने विचार एवं सुझाव अवश दें. अपना कीमती समय निकाल कर मेरी कृति पढने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.