बुधवार, जनवरी 19, 2011

कुछ यूँही



इक रात तेरी उस शाख के ऊपर
कुछ ख्वाब मैंने जा रखे थे
कुछ फीका फीका स्वाद था उनका
पकने को मैंने रख छोड़े थे.

बारिश की बूंदों से वो कुछ
खारे खारे लगते हैं,
कांप रहे थे एक कोने में वो
तपने को बाहों में तेरी रख छोड़े है.

- नीरज

4 टिप्‍पणियां:

  1. मन को छु लेने वाले इस बेहतरीन पोस्ट के लिए सदर आभार |

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  2. बहुत बहुत भाव पूर्ण कविता |
    बधाई

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  3. welcome back ..manyvar bhootpoorv kavi mahoday :P:D:D

    good job :)

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