कुछ यूँही



इक रात तेरी उस शाख के ऊपर
कुछ ख्वाब मैंने जा रखे थे
कुछ फीका फीका स्वाद था उनका
पकने को मैंने रख छोड़े थे.

बारिश की बूंदों से वो कुछ
खारे खारे लगते हैं,
कांप रहे थे एक कोने में वो
तपने को बाहों में तेरी रख छोड़े है.

- नीरज

4 comments:

संजय भास्कर 1/19/2011 09:22:00 PM  

मन को छु लेने वाले इस बेहतरीन पोस्ट के लिए सदर आभार |

संजय भास्कर 1/19/2011 09:26:00 PM  

बहुत बहुत भाव पूर्ण कविता |
बधाई

vandana 1/20/2011 06:33:00 AM  

welcome back ..manyvar bhootpoorv kavi mahoday :P:D:D

good job :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) 1/20/2011 03:57:00 PM  

खूबसूरत ...

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