ख़याल



वक़्त की मेज़ पे कुछ ख़याल अदबुने ही छूट गए थे.
जान पड़ता है की मेरी नींद की चाबी हाथ लग गयी है उनके,
रह रह कर उन्होंने मेरे ख़्वाबों में आना सीख लिया है.

कुछ तो बारिश के पतंगों की तरह बिन बुलाये चले आते हैं,
ऐसा मालूम होता है की कोई सैलानी आया, रुका.....और चला गया.
कुछ मोर बन कर आते हैं, निशानी के तौर पर पंख छोड़ जाते हैं.

तुम जो आओ अगली बार तो मोर बनकर आना
तुम्हे स्याही में भिगो के कागज़ पे उकेर लूँगा.

--नीरज

6 comments:

Aashi 6/18/2011 10:39:00 PM  

lovely... again

●๋• नीर ஐ 6/18/2011 10:45:00 PM  

Thanx.. :)

संगीता स्वरुप ( गीत ) 6/19/2011 02:20:00 PM  

बहुत दिनों बाद कुछ लिखा ...खूबसूरत अभिव्यक्ति

प्रिया 6/22/2011 04:01:00 PM  

arey ye Morpankhi waali kalam ......aur purane zamane ke dawaat to hame bhi dhoondh rahe hain...jaane kahan milegi ...waise likhe uma types hai :-)

●๋• नीर ஐ 6/23/2011 02:16:00 AM  

@sangeeta aunty - bahut bahut shukriya.

●๋• नीर ஐ 6/23/2011 02:17:00 AM  

Priya - thanx.. :)
uma types kya hota hai??

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