शनिवार, सितंबर 24, 2011

रात



पसर-पसर के चल रही है क्यों रात.
कितने करवट चल लिए,
न जाने कितने करवट बाकी हैं.

हर लम्हा टिक-टिक कर चाक की धुन पर गिरता है.
कितनी धुन हैं सुनलीं अब तक,
न जाने कितनी धुनें अभी बाकी हैं.

आढ़े-तिरछे रेले गीले हैं अब तक.
कितनी बूँदें बह गयीं,
न जाने कितनी अब भी बाकी हैं.

-- नीरज

5 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही खूबसूरत.... आनंद ही आ गया....आभार

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  2. नीरज जी...क्या लिखते हैं आप...आपकी रचनाएँ दिल को छू लेतीं हैं.....

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आपके विचार एवं सुझाव मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं तो कृपया अपने विचार एवं सुझाव अवश दें. अपना कीमती समय निकाल कर मेरी कृति पढने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.