रात



पसर-पसर के चल रही है क्यों रात.
कितने करवट चल लिए,
न जाने कितने करवट बाकी हैं.

हर लम्हा टिक-टिक कर चाक की धुन पर गिरता है.
कितनी धुन हैं सुनलीं अब तक,
न जाने कितनी धुनें अभी बाकी हैं.

आढ़े-तिरछे रेले गीले हैं अब तक.
कितनी बूँदें बह गयीं,
न जाने कितनी अब भी बाकी हैं.

-- नीरज

5 comments:

संजय भास्कर 9/24/2011 04:35:00 PM  

बहुत ही खूबसूरत.... आनंद ही आ गया....आभार

संजय भास्कर 9/24/2011 04:37:00 PM  

नीरज जी...क्या लिखते हैं आप...आपकी रचनाएँ दिल को छू लेतीं हैं.....

●๋• नीर ஐ 10/11/2011 01:44:00 PM  

Bahut bahut shukriya Sanjay ji. Aate rahiye. :)

Reena Maurya 2/24/2012 11:33:00 PM  

bahut hi sundar rachana hai...

●๋• नीर ஐ 2/25/2012 06:07:00 AM  

Bahut bahut shukriya Reena Ji :)

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