मंगलवार, जुलाई 07, 2009

गरीब

यूँ तिरछी नज़रें क्यूँ कर देखते हो,
सरकार की नज़रों का नूर हूँ मैं.

कहने को आशियाना बनाते है घोसला तोड़ कर,
घोटाले में फंस, फिर घोंसले में बस जाता हूँ मैं.

चुनावों में सियासी नज़रों का नूर हूँ,
बाद में मनहूस नासूर बन जाता हूँ मैं.

इलाज, कहने को मुफ्त देता है हॉस्पिटल,
दवाईओं के दाम पे पस्त हो जाता हूँ मैं.

खाने को राशन भी सस्ता मिलता है हर महीने,
राशन के इन्तेज़ार में ध्वस्त हो जाता हूँ मैं.

पीड़ ये दिल की कई बहरों को सुना चुका,
सुनने वालों की आस में आज भी गाता हूँ मैं।

--नीरज

2 टिप्‍पणियां:

  1. चुनावों में सियासी नज़रों का नूर हूँ,
    बाद में मनहूस नासूर बन जाता हूँ


    मैं.पीड़ ये दिल की कई बहरों को सुना चुका,
    सुनने वालों की आस में आज भी गाता हूँ मैं।

    waah neeraj bahut bahut acchi rachna hai ..ek dam sacchi or dil ko kondti hui ....har baar ek naye samajik mudde ko itni bhavukta se ubaarte ho yahi apki poetry ki sabse aachi baat hai

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