बुधवार, जुलाई 15, 2009

मेरा देश - आज की नज़र से

हर प्रांत में मेरे देश की
ज़मीं गीली गीली सी लगती है.
मट मैली से कुछ सुर्ख रंग
लिए सी लगती है.

सोने की चिडिया न जाने
कहाँ लुप्त हो गयी है.
आपसी मतभेद से शायद
मुक्त हो गयी है.

सतरंगा इन्द्र धनुष अब
लाल दिखाई देता है.
बादल की हुंकार से ज्यादा
इंसानी शोर सुनाई देता है.

दो चूल्हों की आंच अब
हर घर से आती है.
रिश्तों की लकडी पे अब
रोटी सिक कर आती है.

भूख, प्यास सब त्याग के
मानस धरती पर लड़ता है.
इसकी ही कोख में एक दिन
सोने से डरता फिरता है.

--नीरज

3 टिप्‍पणियां:

  1. waaw neeraj ..ye rachna aaj doosri bar padh rahi hoon.. bahut badiya lagi sach me
    सतरंगा इन्द्र धनुष अब
    लाल दिखाई देता है.
    बादल की हुंकार से ज्यादा
    इंसानी शोर सुनाई देता है.

    उत्तर देंहटाएं
  2. good sab kuch to kah diya aapne.....But never loose hope....badalne ke liya ham log kafi hai na :-)

    उत्तर देंहटाएं
  3. Vandana aur Priya Ji....

    bahut bahut dhanyavaad rachna ki saraahna ke liye. :)
    aate rahiye... :)

    उत्तर देंहटाएं

आपके विचार एवं सुझाव मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं तो कृपया अपने विचार एवं सुझाव अवश दें. अपना कीमती समय निकाल कर मेरी कृति पढने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.