मंगलवार, अक्तूबर 06, 2009

एक ख्वाब...एक सवाल...एक दुआ...

ए महबूब मेरे तू मेरी यादों में है,
मेरे ज़हन में है, मेरे ख्यालों में है.
पहर दर पहर यूँही गुज़र जाते हैं,
तू ज़बान में है, मेरी आँखों में है.

परेशान सी है कुछ मैंने सुना है,
घर लाने का तुझे सपना बुना है.
डरता हूँ समाज से अपने मैं भी,
ज़िक्र पे तेरे मैंने फिकरा सुना है.

हर चेहरे में हर आँखों में ढूंढता हूँ,
फिज़ा में, हर आँचल में ढूंढता हूँ.
चेहरे पे मुखोटे, आँखों में जलन है,
मेरे ईमान हर डगर बस तुझे ढूंढता हूँ.

लुटती हैं अस्मतें सरे आम यहाँ पर,
मुर्दा है ज़मीर इंसान का जहां पर.
टीस दिल की यहाँ कोई समझता नहीं
महबूब मेरी इंसानियत तू है कहाँ पर?

--नीरज

6 टिप्‍पणियां:

  1. मेरी महबूबा बस तू ही तू ... सभी जगह बसी है... दिल से लिखी रचना के लिए धन्यवाद

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  2. इंसानियत तू है कहाँ पर?..ये एक ऐसा प्रशन है जो शायद हर जुबान पर है और उत्तर कहीं नहीं!बेहद संवेदन शील रचना...

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  3. waah neer bahut sunder rachna hui hai ye to ....mujhe to lagta hai ye apki mehbooba insaniyat, bechari har kisi ki chokhat par mooh latkaye baithi hai ander to koi aane deta nahi or bhahaar iska koi thor thikana nahi ...haina ..

    ase hi likhte raho ... best wishes

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  4. बहुत उम्दा भाव एवं सुन्दर अभिव्यक्ति!!

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  5. Aap sabhi ka sneh paakar bahut accha laga....aate rahiye... :)

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