मंगलवार, फ़रवरी 09, 2010

हुंकार




दायरे ऐसे भी बनते हैं कि फिर मिटते नहीं,
लुट जाती हैं हस्तियाँ, कारवां मिटते नहीं.

जितना चाहे रौन्दलो या चाहे कितना तोड़लो,
हौसले फौलादों के आग से जलते नहीं.

रात के हों घुप्प अँधेरे या कई साये घनेरे,
रौशनी की इक किरण के सामने डटते नहीं.

चाहे मीलों हो गगन या कहीं क्षितिज मिलन,
छूने के मंसूबे अपने साँझ संग ढलते नहीं.

शीश उठते हैं गर्व से या जंग में कटते हैं गर्व से,
आजाते हैं जो हम राह में तो मौत से डरते नहीं.

बांधलो चाहे कहीं भी या कहीं भी रोकलो,
"नीर" के भीषण थपेड़े रोकने से रुकते नहीं.

--नीरज

9 टिप्‍पणियां:

  1. awesoooooommmmm ! ek dam solid gajal hai ye to..3rd nd 4th one k liye to claaapppp :)
    or haan 5th sher ne to shole film ka 'angerejo k jamane ka jelar yaad dila diya :P:P...

    ab bole to padhkar kar maja aa gaya ..:)

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  2. @Amitabh Ji -

    Bahut bahut shukriya kriti sarahne ke liye....aate rahiye ga... :)

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  3. @Vandana -

    hehehehe......Thanx a lot, par angrezon ke jailer kaise yaad aa gaya tumhe?? :D :D

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  4. @Udan Tashtari Ji -

    Dhanyavaad sir, aapka sneh paakar accha laga...aate rahiye... :)

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  5. वाह !!!
    बहुत ही सुन्दर रचना...

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  6. @Ranjana Ji -

    Sarahne ke liye bahut bahut shukriya ....:)

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  7. waah neer ke bheeshan thapede......

    bahut khoob kaha hai neer
    aise hi likhte rahe

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