हुंकार




दायरे ऐसे भी बनते हैं कि फिर मिटते नहीं,
लुट जाती हैं हस्तियाँ, कारवां मिटते नहीं.

जितना चाहे रौन्दलो या चाहे कितना तोड़लो,
हौसले फौलादों के आग से जलते नहीं.

रात के हों घुप्प अँधेरे या कई साये घनेरे,
रौशनी की इक किरण के सामने डटते नहीं.

चाहे मीलों हो गगन या कहीं ख्शितिज मिलन,
छूने के मंसूबे अपने साँझ संग ढलते नहीं.

शीश उठते हैं गर्व से या जंग में कटते हैं गर्व से,
आजाते हैं जो हम राह में तो मौत से डरते नहीं.

बांधलो चाहे कहीं भी या कहीं भी रोकलो,
"नीर" के भीषण थपेड़े रोकने से रुकते नहीं.

--नीरज

ख्शितिज - ये सही नहीं है क्योंकि Google Translitration पे सही वर्ण मौजूद नहीं है.

9 comments:

अमिताभ मीत 2/10/2010 05:42:00 AM  

बढ़िया. बधाई.

vandana 2/10/2010 06:23:00 AM  

awesoooooommmmm ! ek dam solid gajal hai ye to..3rd nd 4th one k liye to claaapppp :)
or haan 5th sher ne to shole film ka 'angerejo k jamane ka jelar yaad dila diya :P:P...

ab bole to padhkar kar maja aa gaya ..:)

Udan Tashtari 2/10/2010 07:34:00 AM  

बहुत उम्दा! वाह!

●๋• नीर ஐ 2/10/2010 08:00:00 AM  

@Amitabh Ji -

Bahut bahut shukriya kriti sarahne ke liye....aate rahiye ga... :)

●๋• नीर ஐ 2/10/2010 08:01:00 AM  

@Vandana -

hehehehe......Thanx a lot, par angrezon ke jailer kaise yaad aa gaya tumhe?? :D :D

●๋• नीर ஐ 2/10/2010 08:02:00 AM  

@Udan Tashtari Ji -

Dhanyavaad sir, aapka sneh paakar accha laga...aate rahiye... :)

रंजना 2/10/2010 04:26:00 PM  

वाह !!!
बहुत ही सुन्दर रचना...

●๋• नीर ஐ 2/10/2010 09:29:00 PM  

@Ranjana Ji -

Sarahne ke liye bahut bahut shukriya ....:)

श्रद्धा जैन 2/18/2010 08:08:00 PM  

waah neer ke bheeshan thapede......

bahut khoob kaha hai neer
aise hi likhte rahe

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