शनिवार, जनवरी 30, 2010

सुबह की कटारी से रात काटी है



स्याह रात तेरी याद में काटी है.
सुबह की कटारी से रात काटी है.

मुस्कुराता हूँ देख के तुझे यूँ,
जैसे छत्ते से मैंने शहेद चाटी है.

खोई हो सिलवटों में ज़िन्दगी की,
मैंने उम्र एक गिरह में काटी है.

लिख-लिख के थक गया हूँ तुझे,
कागज़ की सिल पे याद बाटी है.

फिसल गए हैं हम ज़िन्दगी से,
जैसे दिल नहीं,चाक की माटी है.

-नीरज

बाटी - पीसने को भी बोलते हैं. जैसे की पत्थर की सिल पे चटनी बाटना.

10 टिप्‍पणियां:

  1. लिख-लिख के थक गया हूँ तुझे,
    कागज़ की सिल पे याद बाटी है.to yaadein kagaz pe bhi ukar gyee..

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  2. ग़ज़ब के शेर बुने हैं आपने .......... काफिया बहुत ही खूबसूरती से निभाए हैं ........
    सब के सब शेर ..... बहुत नये अंदाज़ के हैं ........

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  3. @Dimple Ji
    Ji...yaadein ya to baras jaati hain ya kaagaz pe ukar jaati hain...
    Aane aur rachna ko padhne ka shukriya.

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  4. @Digambar Ji

    Saraahne ke liye bahut bahut shukriya.... :)

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  5. woooooooooowwww kya baat hai ..kya baat haii..kya solid andaaj se raat kati hai ...maja aa gaya padhkar ...or 2nd sher ke liye to.. clap.clap clap haahhahahha..:):)

    bbahut sunder gajal!

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  6. bahut umda lekhan he aapka....har sher mano apni hi tanhai ki kahani keh raha ho. bahut khoob.

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  7. @Anamika JI

    Bahut bahut shukriya...aap ko apne blog par dekh kar accha laga... :)

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आपके विचार एवं सुझाव मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं तो कृपया अपने विचार एवं सुझाव अवश दें. अपना कीमती समय निकाल कर मेरी कृति पढने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.