सुबह की कटारी से रात काटी है



स्याह रात तेरी याद में काटी है.
सुबह की कटारी से रात काटी है.

मुस्कुराता हूँ देख के तुझे यूँ,
जैसे छत्ते से मैंने शहेद चाटी है.

खोई हो सिलवटों में ज़िन्दगी की,
मैंने उम्र एक गिरह में काटी है.

लिख-लिख के थक गया हूँ तुझे,
कागज़ की सिल पे याद बाटी है.

फिसल गए हैं हम ज़िन्दगी से,
जैसे दिल नहीं,चाक की माटी है.

-नीरज

बाटी - पीसने को भी बोलते हैं. जैसे की पत्थर की सिल पे चटनी बाटना.

10 comments:

सतीश सक्सेना 1/30/2010 11:21:00 AM  

वाह ! शुभकामनाएं !

dimple 1/30/2010 03:28:00 PM  

लिख-लिख के थक गया हूँ तुझे,
कागज़ की सिल पे याद बाटी है.to yaadein kagaz pe bhi ukar gyee..

दिगम्बर नासवा 1/30/2010 04:32:00 PM  

ग़ज़ब के शेर बुने हैं आपने .......... काफिया बहुत ही खूबसूरती से निभाए हैं ........
सब के सब शेर ..... बहुत नये अंदाज़ के हैं ........

●๋• नीर ஐ 1/30/2010 06:54:00 PM  

@Satish Ji
Bahut bahut dhanyavaad... :)

●๋• नीर ஐ 1/30/2010 06:56:00 PM  

@Dimple Ji
Ji...yaadein ya to baras jaati hain ya kaagaz pe ukar jaati hain...
Aane aur rachna ko padhne ka shukriya.

●๋• नीर ஐ 1/30/2010 06:56:00 PM  

@Digambar Ji

Saraahne ke liye bahut bahut shukriya.... :)

vandana 1/30/2010 07:14:00 PM  

woooooooooowwww kya baat hai ..kya baat haii..kya solid andaaj se raat kati hai ...maja aa gaya padhkar ...or 2nd sher ke liye to.. clap.clap clap haahhahahha..:):)

bbahut sunder gajal!

अनामिका की सदाये...... 1/30/2010 11:19:00 PM  

bahut umda lekhan he aapka....har sher mano apni hi tanhai ki kahani keh raha ho. bahut khoob.

●๋• नीर ஐ 1/31/2010 08:20:00 AM  

@Vandana
Shukriya shukriya vandana.... :)

●๋• नीर ஐ 1/31/2010 08:20:00 AM  

@Anamika JI

Bahut bahut shukriya...aap ko apne blog par dekh kar accha laga... :)

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