संभाल के तकिये के सिरहाने रख छोड़े थे.
सोचा था होश आने पे भट्टी में
पका के पुख्ता कर लूँगा,
पर आँख खुली तो सवेरे ने ख्वाब के
कुछ चमकीले टुकड़े गिरह में लपेट के
सुनहरे ख्वाब
Posted by
●๋• नीर ஐ
Saturday, January 02, 2010
आसमान के सितारे हर रात उतर के
मेरी आँखों में झिलमिलाने चले आते थे,
चाँद रोज़ उतर के थपकी देता था, फिजा
लोरियां सुनाती थी.
कई ख्वाब फलक से तोड़े थे वहां पर.
रात की बेहोशी में मैंने कुछ ख्वाब
तकिये के सिरहाने रख छोड़े थे.
कभी जो जाओ तुम उस बूढ़े मकान में
जो आज भी वृधाश्रम के बूढ़े की तरह
अपने बच्चों की राह तक रहा होगा,
तो वो ख्वाब उन्ही गिरहों में लपेटे हुए
लेते आना और फिर एक बार मेरे
सिरहाने रख देना,
मेरा ताबूत जगमगा उठेगा.
--नीरज
Labels: My Poems





4 comments:
tumhare 1st para ne gaanv k aangan me sona yaad dila diya ...vo chand taro ke saath ...aasmaan ki mehfil ka luft uthana or jaate hue plain ko raat me chalta hua tara kehna ...kisi tootte taare ko dekhkar wish karna or daadi kehne par k apshagun hai ..thoo thoo karke thookna ....
sachmuch bahuuuut pyari najm hai :)
@vandana -
Thanx a lot....kriti safal hui jo ye tumhare dil tak pahunch air beete din fir se yaad aa gaye.... :)
I never met my grandparents....so ur creation makes me emotional...dun knw y....
gr8....
:)
Thanx mou. :)
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