ख्वाब




रात की बेहोशी में मैंने कुछ ख्वाब 
संभाल के तकिये के सिरहाने रख छोड़े थे.
सोचा था होश आने पे भट्टी में
पका के पुख्ता कर लूँगा,
पर आँख खुली तो बेहोशी ने ख्वाब के 
चमकीले टुकड़े तकिये के सिरहाने 
रख छोड़े थे.

--नीरज 

3 comments:

Udan Tashtari 1/02/2010 05:44:00 AM  

ओह!


वर्ष २०१० मे हर माह एक नया हिंदी चिट्ठा किसी नए व्यक्ति से भी शुरू करवाने का संकल्प लें और हिंदी चिट्ठों की संख्या बढ़ाने और विविधता प्रदान करने में योगदान करें।

- यही हिंदी चिट्ठाजगत और हिन्दी की सच्ची सेवा है।-

नववर्ष की बहुत बधाई एवं अनेक शुभकामनाएँ!

●๋• नीर ஐ 1/02/2010 03:56:00 PM  

Aap ko bhi Nav varsh ki bahut bahut badhai aur kriti par aane ke liye shukriya... :)

शबनम खान 1/02/2010 04:03:00 PM  

ख्वाब तो ख्वाब ही रहेंगे...जो हक़ीकत में बदल जाएँ वो ख्वाब ही कहाँ...वो तो बस इच्छाएँ कहलाएंगी...

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