मंगलवार, दिसंबर 15, 2009

माँ मुझे फिर एक बार अपने अंचल में सो जाने दे




कई रातें बीतीं हैं यूँही पलकें झपकते-झपकते,
माँ मुझे अपनी गोद में फिर जी भर के सो जाने दे.

नींद से अचानक यूँही जाग जाया करता हूँ अक्सर,
माँ मुझे रात भर तेरा हाथ पकड़ के सो जाने दे.

ये मखमली गद्दा अब मेरे बदन में गड़ने लगा है,
माँ मुझे अपने साथ चटाई पे सो जाने दे.

गिद्ध मंडराते हैं ख्वाबों में मेरे हर रात, हर पहर,
माँ मुझे फिर झूमर के नीचे सो जाने दे.

बाज़ार के कपड़ों में ठण्ड नहीं बचती है ज़रा भी,
माँ तेरे हाथ के एक स्वेटर में ठण्ड को खो जाने दे.

दूर आ गया था तुझसे भौतिक चाहतों में लिपट के,
माँ मुझे फिर एक बार अपने अंचल में सो जाने दे.
माँ मुझे फिर एक बार तेरी लोरिओं में खो जाने दे.
माँ मुझे फिर एक बार तेरी थाप्किओं में सो जाने दे.

-नीरज

8 टिप्‍पणियां:

  1. भावुक कर गये नीरज भाई आप!!

    सुन्दत अभिव्यक्ति!! माँ का प्यार -कोई कैसे भूल सकता है!

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  2. मेरी माँ नहीं है.... आपकी यह कविता पढ़ कर रोना आ गया..... बहुत सुंदर कविता है,..... दिल के अन्दर तक उतर गई.....

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  3. बहुत भावपूर्ण रचना है।लगता है बहुत गहरे डूब कर लिखी है यह रचना जो आँखो को भिगो गई।बहुत बेहतरीन रचना है।

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  4. poetry to lajavaab hai hi :)..par pic samjh nahi aayi.....mujhe to laga tha koi badhiya si pic lagai hogi :( ??

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  5. @All
    Aap sabhi ke yahan par aane aur rachna ko itna pyaar dene k liye bahut bahut shukriya. :)

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  6. sacchi neer! Maa se achcha behatar kuch nahi..... parents ka rishta hi bas niswart hota hai .....bilkula sachcha sa

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  7. oyyee yaar mummy ki yaad aa rahi thi to tumhari ye najm yaad aayi .bahut accha laga dubara padhke bhi thankss :)....pic bhi change ho gayi achha hai :)

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आपके विचार एवं सुझाव मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं तो कृपया अपने विचार एवं सुझाव अवश दें. अपना कीमती समय निकाल कर मेरी कृति पढने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.