लहर



ये नदी और इस के ये दो किनारे,
सदियों से दो भाई जुदा हों, लगता है.
लहरें रोज़ आती हैं दोनों से मिलने,
दोनों को छूती हैं और चली जाती हैं.
कौन जाने ये कहीं बीच में ही खो जाती हैं या
एक भाई का सन्देश दुसरे को पहुंचती हैं.

कई दिन गुज़रे हैं तोहफा नहीं लायी लहर,
न सन्देश लायी है कोई उस पार से.
पिछली बार कुछ चिकने पत्थर आये थे,
तो कुछ यहाँ से भी भिजवाए थे जवाब में.
आज कल माहोल शांत है, यहाँ का भी वहां का भी,
लगता है लहर ने आज कल सीधा बहना सीख लिया है.

ये नदी और इस के ये दो किनारे,
सदियों से दो भाई जुदा हों, लगता है.

--नीरज

10 comments:

Sunil Kumar 8/03/2010 06:42:00 PM  

दिल की गहराई से लिखी गयी एक सुंदर रचना , बधाई

●๋• नीर ஐ 8/03/2010 08:13:00 PM  

@Sunil Ji - Bahut bahut shukriya aane aur sarah ne k liye. :)

अनामिका की सदायें ...... 8/03/2010 10:49:00 PM  

sunder aur gahre bhaav liye rishto ki duri mahsoos karti acchhi abhivyakti.

vandana 8/04/2010 06:01:00 AM  

very nice neer ,,badhiya najm hui hai :)

●๋• नीर ஐ 8/04/2010 07:05:00 AM  

@Anamika Di - Bahut bahut shukriya di, aap ko yahan dekh kar accha laga. :)

●๋• नीर ஐ 8/04/2010 07:06:00 AM  

@Vandu - Thanx a lot. :)

शिवम् मिश्रा 8/04/2010 02:28:00 PM  

एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

संजय भास्कर 8/05/2010 06:34:00 AM  

हमेशा की तरह ये पोस्ट भी बेह्तरीन है
कुछ लाइने दिल के बडे करीब से गुज़र गई....

mai... ratnakar 8/05/2010 11:53:00 PM  

wah! bahut khoob likha hai, padh kar behad achchha laga

●๋• नीर ஐ 8/08/2010 05:12:00 PM  

@Shivam ji, Sanjay ji, mai ji - Aap logon ka aane ka aur sarahne k liye bahut bahut shukriya. :)

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