लाल भारत



खूब उड़ा है लाल गुलाल,
रंग हुआ है देश का लाल.
मन मानी भाई करी है सबने,
कौन बना है देश का लाल??

लालगढ़ के लाल हैं लाल,
बरफ भी हुई है फिर से लाल.
परवाह है भाई तुमको किसकी,
लगा के घूमो बत्ती लाल.

डुबा-डुबा के डुबा दिया है,
खेल भी कर दिये तुमने लाल.
फिर भी शर्म से भैया तोरे,
नहीं हैं बिलकुल लाल ये गाल.

जाने कैसे सुनोगे तुम ये,
कैसे होगी पतली खाल??

--नीरज

4 comments:

संजय भास्कर 8/10/2010 11:07:00 PM  

ऐसी कवितायें रोज रोज पढने को नहीं मिलती...इतनी भावपूर्ण कवितायें लिखने के लिए आप को बधाई...शब्द शब्द दिल में उतर गयी.

vandana 8/11/2010 08:28:00 AM  

kam sabdo me sunder baat kahi hai is rachna me ..nice one neer :)

crazy devil 11/20/2010 11:23:00 AM  

accha laga padhkar

●๋• नीर ஐ 11/21/2010 11:16:00 PM  

@Crazy Devil - Bahut bahut shukriya

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