मिलन



आग को बाहों में थामे दूर
आकाश में उड़ रही थी रुई,
मुसाफिरों का कौतूहल
उड़ा रहा था धुल का गुबार,
गुन-गुनाते उड़े आ रहे थे आशियाने
में अपने वापिस मुसाफिर.
तो कहीं डाली पे बैठ कर
फिजा खिल-खिला रही थी,

चलो चलें हम भी कुछ
गीत गा लें, मुस्कुरा लें.
दिन का रात से मिलने
का समय हो गया है.

--नीरज

9 comments:

Udan Tashtari 3/24/2010 04:07:00 AM  

वाह! बहुत खूब!

-

हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

अनेक शुभकामनाएँ.

vandana 3/24/2010 08:33:00 AM  

woww ..awesom ...sunadar hai bahut ye najm :):) musafiro ka lotna ..waw:)

●๋• नीर ஐ 3/24/2010 08:56:00 AM  

@Tashtari ji - Bahut bahut shukriya.... :)

●๋• नीर ஐ 3/24/2010 08:57:00 AM  

@Vandana - Dhanyavaad madam.... :D

sangeeta swarup 3/24/2010 11:37:00 AM  

बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति.....बधाई

jini 3/27/2010 10:56:00 AM  

very nice... good keep it up ..

●๋• नीर ஐ 3/27/2010 10:58:00 AM  

@Jini -

Thanx alot... :)

Priya 4/12/2010 11:10:00 PM  

waah! koi shaam aise bayan hoti hai... aaj pata chala...hamko to prakriti ko lekar likha gaya koi bhi chitran bhata hai .....khoobsoorat khyaal

●๋• नीर ஐ 4/14/2010 07:13:00 AM  

@Priyanka - Bahut bahut shukriya. :)

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