आग को बाहों में थामे दूर
आकाश में उड़ रही थी रुई,
मुसाफिरों का कौतूहल
उड़ा रहा था धुल का गुबार,
गुन-गुनाते उड़े आ रहे थे आशियाने
में अपने वापिस मुसाफिर.
तो कहीं डाली पे बैठ कर
फिजा खिल-खिला रही थी,
चलो चलें हम भी कुछ
गीत गा लें, मुस्कुरा लें.
दिन का रात से मिलने
का समय हो गया है.
--नीरज





9 comments:
वाह! बहुत खूब!
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हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!
लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.
अनेक शुभकामनाएँ.
woww ..awesom ...sunadar hai bahut ye najm :):) musafiro ka lotna ..waw:)
@Tashtari ji - Bahut bahut shukriya.... :)
@Vandana - Dhanyavaad madam.... :D
बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति.....बधाई
very nice... good keep it up ..
@Jini -
Thanx alot... :)
waah! koi shaam aise bayan hoti hai... aaj pata chala...hamko to prakriti ko lekar likha gaya koi bhi chitran bhata hai .....khoobsoorat khyaal
@Priyanka - Bahut bahut shukriya. :)
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