मंगलवार, मार्च 23, 2010

मिलन



आग को बाहों में थामे दूर
आकाश में उड़ रही थी रुई,
मुसाफिरों का कौतूहल
उड़ा रहा था धुल का गुबार,
गुन-गुनाते उड़े आ रहे थे आशियाने
में अपने वापिस मुसाफिर.
तो कहीं डाली पे बैठ कर
फिजा खिल-खिला रही थी,

चलो चलें हम भी कुछ
गीत गा लें, मुस्कुरा लें.
दिन का रात से मिलने
का समय हो गया है.

--नीरज

9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह! बहुत खूब!

    -

    हिन्दी में विशिष्ट लेखन का आपका योगदान सराहनीय है. आपको साधुवाद!!

    लेखन के साथ साथ प्रतिभा प्रोत्साहन हेतु टिप्पणी करना आपका कर्तव्य है एवं भाषा के प्रचार प्रसार हेतु अपने कर्तव्यों का निर्वहन करें. यह एक निवेदन मात्र है.

    अनेक शुभकामनाएँ.

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  2. woww ..awesom ...sunadar hai bahut ye najm :):) musafiro ka lotna ..waw:)

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  3. बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति.....बधाई

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  4. waah! koi shaam aise bayan hoti hai... aaj pata chala...hamko to prakriti ko lekar likha gaya koi bhi chitran bhata hai .....khoobsoorat khyaal

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आपके विचार एवं सुझाव मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं तो कृपया अपने विचार एवं सुझाव अवश दें. अपना कीमती समय निकाल कर मेरी कृति पढने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.