शनिवार, मार्च 27, 2010

भरम है या हकीकत कोई?



जी चाहता है की तेरे दिन को अपनी शाम से मिला दूँ,
जो लाली उपजे इस मिलन से उसे तेरे माथे पे सजा दूँ.

घुल जाएँ दो पहर जो हैं कुछ जुदा-जुदा से,
बाहों में आओ तो तुम्हे रोम-रोम में बसा दूँ.

राहों में खड़ी दूरियाँ सिमट जाएँ सभी,
जो मैं तेरी हथेली से हथेली मिला दूँ.

आसमान रात भर तरसता रहे दीदार को,
तेरी खातिर चाँद को मैं आँगन में बुला दूँ.

तेरे एहसास का भरम है या हकीकत कोई?
जो भी है, आ तुझे अपनी नज़रों में बसा दूँ.

-- नीरज

14 टिप्‍पणियां:

  1. जी चाहता है की तेरे दिन को अपनी शाम से मिला दूँ,
    जो लाली उपजे इस मिलन से उसे तेरे माथे पे सजा दूँ.

    घुल जाएँ दो पहर जो हैं कुछ जुदा-जुदा से,
    बाहों में आओ तो तुम्हे रोम-रोम में बसा दूँ.

    राहों में खड़ी दूरियाँ सिमट जाएँ सभी,
    जो मैं तेरी हथेली से हथेली मिला दूँ.

    आसमान रात भर तरसता रहे दीदार को,
    तेरी खातिर चाँद को मैं आँगन में बुला दूँ.

    तेरे एहसास का भरम है या हकीकत कोई?
    जो भी है, आ तुझे अपनी नज़रों में बसा दूँ.

    Bahut Sundar...

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  2. @Sangeeta Maasi - Sneh ke liye bahut bahut shukriya... :)

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  3. @Kunwar Ji - Bhaut bahut shukriya...accha laga aap yahan aaye aur kriti ko saraha...aate rahiga... :)

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  4. @Firdaus Ji - Aaane aur sarahne ke liye tahe dil se shukriya...aate rahiye ga... :)

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  5. @Rajey Ji - Aane aur sarahne ke liye shukriya...aate rahiye ga... :)

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  6. oyyee waah ek or...

    poori gajal behad khoobsoorat hai ..par 4th one to fev hua :)toooo good :)

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  7. निशान छोड़ गए भाई.. बहुत खूब

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आपके विचार एवं सुझाव मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं तो कृपया अपने विचार एवं सुझाव अवश दें. अपना कीमती समय निकाल कर मेरी कृति पढने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.