बुधवार, सितंबर 09, 2009

** हाइकु **

रात सिकुडी,
साँसें ठहरी सी हैं.
गरीब सच...

--नीरज

8 टिप्‍पणियां:

  1. हाईकु पढ़ा,
    टंकित टिप्पणी की
    काम तमाम!!

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  2. Itana dukh bhara haeku kyun

    Aapko to likhna chahiye

    Rat madhosh see
    chand khamosh sa
    samne tum

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  3. Bahut bahut dhanyavaad aap sabhi ko jo aapne itna saraha.

    aate rahiye ga... :)

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  4. बेनामी10/10/2009 10:49:00 pm

    आपका हाइकु पढा और कई बार पढा, लेकिन उसमें कोई कालजयी तत्व नजर नहीं आया। गरीब सच की जगह यदि गरीबी सच रखें तो शायद थोडी बात बन जाए।

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  5. गरीब सच इसलिए है क्यों की एक गरीब इंसान की बात हो रही है और गरीब का सच भी उतना ही गरीब होता है जितना वो खुद.

    पढने के लिए शुक्रिया. :)

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आपके विचार एवं सुझाव मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं तो कृपया अपने विचार एवं सुझाव अवश दें. अपना कीमती समय निकाल कर मेरी कृति पढने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.