कश्ती

ख़्वाबों की एक कश्ती है,
जो पलकों की वादी के पार
रोज़ चली आती है.
कभी सतरंगी ख्वाब लाती है
कभी बेरंगी ख्वाब सजा लाती है.

--नीरज

5 comments:

दिलीप 5/08/2010 12:35:00 PM  

waah lajawaab...

nilesh mathur 5/08/2010 01:34:00 PM  

वाह! बहुत ही कम शब्दों में आप अपनी बात कह जाते हैं!

●๋• नीर ஐ 5/08/2010 01:59:00 PM  

@Nilesh Ji - Bahut bahut dhanyavaad. aate rahiye... :)

●๋• नीर ஐ 5/08/2010 01:59:00 PM  

@Dilip Ji - Shukriya. :)

संजय भास्कर 5/08/2010 02:34:00 PM  

BEAUTIFUL........

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