फलक



न जाने कब ये शाम का गोला ढल जाए.
और एक स्याह रात की चादर सिल जाए.
करोड़ों जगमगाते टुकड़े पैबंद हों उस पर,
स्याह शामियाने पे नक्काशी खिल जाए.

तू रोज़ देखता है टक-टकी लगाए मुझे.
बढाऊँ हाथ जो ऊपर, तू छिटक जाए मुझे
किसी रोज़ पैबंद हो जाऊं शामियाने पर,
ए खुदा तू कभी फलक पे बसा आए मुझे.

--नीरज

10 comments:

श्यामल सुमन 5/31/2010 09:34:00 PM  

कम शब्दों में गहरी बात - बहुत सुन्दर।

सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com

दिलीप 5/31/2010 09:44:00 PM  

waah lajawaab

●๋• नीर ஐ 5/31/2010 10:01:00 PM  

@Shyamal Ji - Bahut bahut shukriya.... :)

Jandunia 5/31/2010 10:10:00 PM  

बहुत सुंदर

●๋• नीर ஐ 5/31/2010 10:32:00 PM  

@Dilip Ji - Dhanyavaad aane ke liye... :)

sangeeta swarup 5/31/2010 11:10:00 PM  

खूबसूरत

राजेन्द्र मीणा 6/01/2010 01:10:00 AM  

बहुत अच्छा लिखा है ...सुन्दर !!!

●๋• नीर ஐ 6/01/2010 08:05:00 AM  

@Jandnia, Maasi Ji, Rajendra Ji - Shukriya... :)

dimple 6/01/2010 04:38:00 PM  

स्याह रात अपने दामन में दिन के सारे उजाले छिपा लेती है.फिर भी कही न कही से सितारे बन के आस्मां की चादर से उजाले झांकते रहते है.

●๋• नीर ஐ 6/14/2010 08:22:00 AM  

Dimple ji - Aane ke liye bahut bahut shukriya. :)

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