न जाने कब ये शाम का गोला ढल जाए.
और एक स्याह रात की चादर सिल जाए.
करोड़ों जगमगाते टुकड़े पैबंद हों उस पर,
स्याह शामियाने पे नक्काशी खिल जाए.
तू रोज़ देखता है टक-टकी लगाए मुझे.
बढाऊँ हाथ जो ऊपर, तू छिटक जाए मुझे
किसी रोज़ पैबंद हो जाऊं शामियाने पर,
ए खुदा तू कभी फलक पे बसा आए मुझे.
--नीरज





10 comments:
कम शब्दों में गहरी बात - बहुत सुन्दर।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
www.manoramsuman.blogspot.com
waah lajawaab
@Shyamal Ji - Bahut bahut shukriya.... :)
बहुत सुंदर
@Dilip Ji - Dhanyavaad aane ke liye... :)
खूबसूरत
बहुत अच्छा लिखा है ...सुन्दर !!!
@Jandnia, Maasi Ji, Rajendra Ji - Shukriya... :)
स्याह रात अपने दामन में दिन के सारे उजाले छिपा लेती है.फिर भी कही न कही से सितारे बन के आस्मां की चादर से उजाले झांकते रहते है.
Dimple ji - Aane ke liye bahut bahut shukriya. :)
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