गुरुवार, अप्रैल 09, 2009

कन्या भ्रूण हत्या - 2



घनघोर अँधेरा था,
मौसम पर जेठ का डेरा था.
सड़कें सुनसान थीं,
पर कहीं चट-पट का डेरा था.

रात के 10 बज चले थे,
सारे कुत्ते सो चुके थे.
बस डॉ. साहब जागे हुए थे,
किसी काम में बीदे हुए थे.

एक पहर और बीत गया था,
आवाज़ का यका यक विस्तार हुआ.
Pulsar पर दो आकृतियाँ सवार हुईं,
उफ्फ्फ...आज फिर कोई इसका शिकार हुआ.

सुबह माता जी ने बतलाया,
आज फिर एक भ्रूण पाया गया है.
सरोवर को एक और,
बच्ची के भ्रूण का भोग लगाया गया है.

अब बस करो ये नरसंहार,
आज की बेटी बेटों से आगे है.
उसका चंदा मामा अब कहानियों में नहीं,
वो तो खुद उनसे मिलके आती है.

हर माँ बाप की लावण्या है,
हर माँ बाप की कीर्ति है.
मान है वो सम्मान है वो,
हम सब की जननी है वो.

--नीरज

2 टिप्‍पणियां:

  1. अब बस करो ये नरसंहार,
    आज की बेटी बेटों से आगे है.
    उसका चंदा मामा अब कहानियों में नहीं,
    वो तो खुद उनसे मिलके आती है.

    wonderful neer.. bahut shaandar kavita kahi hai.

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  2. मत रोको माँ!
    मुझे मिट जाने दो
    ताकि
    इस अग्निपरीक्षा से
    गुजरना न पड़े मुझको,

    मिट ही जाने दो
    इस अबोली/ अदेखी को
    ताकि
    बार बार मिटने का
    दुःख बाकी न रह जाए
    तुम्हारी तरह!

    मत रोको माँ!

    अपनी कोख की तरफ बढ़ते
    इन हत्यारे हाथों को,

    अलबत्ता
    रोक लो
    ये आंसू... ये छटपटाहट
    क्योकि-
    इनमे तुम मुझे छिपा नहीं पाओगी
    मैं
    अपूर्ण ही सही
    पहचान ली गयी हूँ!!

    *amit anand

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