शुक्रवार, अप्रैल 10, 2009

बुढापा



आज मेरे मुन्ना का जन्मदिन है,
32 का हो 33 में लग गया मेरा मुन्ना.

आज भी वो दिन नहीं भूला जब अस्पताल से लाया था,
बीवी की आहुति देकर मुन्ना घर ले आया था.
माँ भी मैं था और बाप भी मैं,
माँ का आँचल कभी खलने नहीं दिया था.

घर में जो भी चीज़ आती थी,
वो उसकी पसंद की ही आती थी.
मुझे क्या पता था एक रोज़ ये आदत बन जायेगी,
मेरी बहु भी किसी दिन बस यूँही आ जायेगी.

कल तक हम लोग साथ रहते थे,
आज वो अपने बेडरूम में और
मैं अपने बेडरूम में रहता हूँ.
कल तक मुन्ना मेरे साथ रहता था,
आज मैं मुन्ने के साथ रहता हूँ.

कल तक मेरी खांसी खलती न थी,
आज वो उसको disturb करती है.
कल तक मैं खुलके जीता था,
आज उसी घर में डरा-डरा सा रहता हूँ.

न जाने आज की नस्ल को क्या हुआ है,
अपनी ही फसल खरपतवार नज़र आती है.
फसल काट घर ले जाते हैं,
खरपतवार खेत में डली नज़र आती है.

--नीरज

2 टिप्‍पणियां:

  1. कल तक मेरी खांसी खलती न थी,
    आज वो उसको disturb करती है.
    कल तक मैं खुलके जीता था,
    आज उसी घर में डरा-डरा सा रहता हूँ.

    न जाने आज की नस्ल को क्या हुआ है,
    अपनी ही फसल खरपतवार नज़र आती है.
    फसल काट घर ले जाते हैं,
    खरपतवार खेत में डली नज़र आती है.

    yeh kavita pehle bhi padhi hai, bahut hi khoobsurati se bayan kiya hai dard ko.
    bahut khoob

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