बुधवार, मई 20, 2009

सिन्दूर


लाल साड़ी के पल्लू पे काश दाग चड़ा होता,
हल्दी, सिन्दूर न सही कीचड से ही जड़ा होता.

जोड़े में सहेज, रख लेती उस दाग को,
काश अम्मा-बाउजी ने वो दाग माथे मड़ा होता.

नीली छत्री के तले रोज़ दिल भिगाती हूँ,
दाग होता तो दिल पे सिन्दूर चड़ा होता.

कर्त्तव्य की आड़ में क्यों धोखा दिया,
देते न तो आज जीवन बिन बैसाखी खड़ा होता.

तुम्हारी ये मासूम कली फूल भी बनती,
गर सिन्दूर नशे में मसलने पे न अड़ा होता.

दिल को हर गली-कूचे ढूंढती फिरती हूँ,
काश के दिल इसी शहर में कहीं पड़ा होता.

--नीरज

3 टिप्‍पणियां:

  1. wah wah wah wah neeraj .............apni bhavnao ko sabdo me perona ek alag baat hai jo koi bhi karta hai....magar doosro par kavita karna aasaan nahi hota ,....or itne ehsaaso se bhari rachna ko padhkar vakai bahut aacha laga ...bahuuuuut khoob

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  2. Bahut bahut shukriya Vandana sarahne ke liye aur mitr ki bhaavnaaon ko samajhne ke liye.

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  3. Neeraj, aapne bahut imaandari se ek ladki ki vyadya ka vyakhyan kiya hain
    achcha likha aapne

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आपके विचार एवं सुझाव मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण हैं तो कृपया अपने विचार एवं सुझाव अवश दें. अपना कीमती समय निकाल कर मेरी कृति पढने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया.